Sunday, February 26, 2017

सस्सी...इक रज़ामंदी

फेफड़ों में क़ैद साँसों को आज़ाद किया तो सस्सी ने अपना मिज़ाज कुछ दुरुस्त पाया, “दफा करो इस बकवास को, कोई और बात करतें हैंसोचा की मौज़ूअ बदल गया लेकिन तजवीज़ तो पहले ही गोशा--ख़याल में मुकम्मल तौर पर बैठ चुकी थी |
अच्छा यह बताओ इस साल की बढ़ोत्तरी कैसी रही?”
अब यह मौज़ू प्रभात के मिज़ाज़ के लिए हरगिज़ मुफ़ीद था |
हम आपकी तरह खुश किस्मत कहाँ हैं मोहतरमा |”
क्यों, क्या हुआ?”
बढ़ोत्तरी क्या कहिये, मायूसी कहिये और हालात यहाँ तक बेज़ार हैं कि बाहर भी कहीं कोई नौकरी नहीं मिल रही | जिंदगी की माँ बहिन...माफ़ करना कुछ ज्यादा...
कोई बात नहीं ... याद हैं गुज़िश्ता वक़्त जब हमने नई नई नौकरी शुरू की थी और दिल की भड़ास निकालने के लिए हर शाम दफ्तरी वक़्त के बाद छत पर बुलन्द आवाज़ में अपने बॉस को कितनी गालियाँ देते थे |”
ज्यों ज्यों माज़ी आँखों से गुज़रता रहा त्यों त्यों उन बुझी हुई आँखों में रोशनी भरती रही | वहाँ जिन्दगी आम और सादा थी, मौजूदा वक़्त की तरह पेचदार या उलझी हुई नहीं | तब हर रोज़ हर काम में नयी सीख नयी उमंग होती थी, तब हर सुबुह जोश लबरेज़ और शाम जश्न लगती थी |
हाँ, और वो तुम्हारा पहला बॉस, जो हर वक़्त तुम्हे छेड़ने की फ़िराक में रहता था, आख़िरकार अपनी करतूतों के चलते नौकरी से निकाला गया |”“वैसे हफ्ते के आख़िर में क्या कर रही हो, मेरी तो बीवी वापस रही है |” सस्सी के लिहाज़ से यह कोई नया सवाल नहीं था, वो प्रभात का इस सवाल के पीछे का मक़सद खूब समझती थी |
हाँ, मालूम है तुम क्या कहोगे...मै हफ्ते के आख़िर में भी दफ्तर ही जा रही हूँ |”“क्या जाना वाकई ज़रूरी है?” प्रभात ने तिरछी निग़ाह करके पूछा |
सस्सी दिल शिकन अंदाज़ में मुस्कुराई, “नहीं, यह तो मेरे मिज़ाज़ पर है, अगर ज़रूरी नहीं भी हुआ तो ज़रूरी बनाने में वक़्त ही कितना लगता है आख़िरकार अब मैं बॉस हूँ |” और दोनों ठहाके लगा कर हसने लगे |

दिन की मुलाक़ात जब शाम से हुई तो लोगो ने अपने अपने गुलूबंद, टोपी, जैकेट और बस्ते उठाकर दफ्तर छोड़ना शुरू कर दिया | हालाँकि, कुछ अपने दोस्त कम साथी की खुशामद कर रहे थे कि वो फाइल बाज़ू में रखे और जल्दी से कंप्यूटर बंद करे ताकि वो साथ में दफ्तर छोड़ सके | और कुछ तो इंतज़ार में बैठे थे उन लोगो के जो रास्ते में इन्हे घर छोड़ दे लेकिन फिलहाल वो लोग मसरूफ़ थे अपना काम खत्म करने में | और कुछ बावज़ूद दिन खत्म हो जाने के दफ्तर को छोड़कर कहीं जाना ही नहीं चाहते थे | जैसे जैसे लोग निकलते गए वो अपनी अपनी मेज़ पर लगे दूधिया रौशनी के बल्ब को भी बुझाते गए | और आख़िरकार पूरी मंज़िल वीरानियत और तारीकी के हवाले हो गयी फ़क़त कुछ मेज़ों को छोड़कर जहाँ दुधिया रौशनी के बल्ब अब भी रोशन थे | उन खाली मेज़ो के दरमियां एक मेज़ प्रभात की भी थी जिसका जलता हुआ बल्ब दफ्तर में पसरी तारीकी को अब भी रौशन कर रहा था | दरअसल प्रभात दफ्तर देर से आने की कीमत चुका रहा था | बहरहाल, सस्सी ही देर से दफ्तर आई थी और ही काम के बोझ तले दबी थी फिर भी उसकी मुतफ़क्किर(विचारवान) निगाहें लैपटॉप को घूर रही थी | यक़ीनन क़यास करना (अनुमान करना) मुश्क़िल था कि वो माज़ी में दफ़न किस रंज की निहानी (तराशना) कर रही थी या साफ़ तौर पर स्क्रीन सवेर में खोई हुई थी जो तसव्वुर को क़ायनात के आख़िर छोर की तफ़रीह करा रहा था | सस्सी चाहती तो वक़्त के साथ चल सकती थी बावज़ूद इसके उसने वक़्त में पीछे चलना मंज़ूर किया था | आहिस्ता आहिस्ता वो आज फिर माज़ी की किसी गली से गुज़र रही थी | वक़्त दूर निकल चुका था और वो लम्हो में ठहर गयी थी | दूसरी ज़ानिब प्रभात दफ्तर छोड़ने के लिए खड़ा हुआ तो खुद के कदमो को सस्सी के दफ्तर की सिम्त पाया | खुले हुए शीशे के दरवाज़े पर एक हल्की दस्तक के साथ वो दाख़िल हुआ और सस्सी की मेज़ के सामने हाज़िर हो गया | उसकी उँगलियों के पोर कुर्सी के किनारे सहला रहे थे और नज़रे झुकी हुई थी | सस्सी की निगाहें भी प्रभात के रुख पर थम गयी और इंतज़ार करने लगी उसका जो वो कहने आया था |
उस मशविरे के लिए तुमसे माफ़ी चाहता हूँ |” बिना सस्सी की ज़ानिब देखे वो बुदबुदाया |
सस्सी ने एक गहरी सांस ली, चश्मे को आँखों से उतरा और चन्द मुतफ़क्किर(विचारवान) लम्हात के बाद अपनी कुर्सी से उठकर उसके पास जाकर कहा, “मुझे लगता है तुम सही हो, आख़िर हर्ज़ ही क्या है तुम्हारे मशविरे में, निहायत ही अमली और मन्तक़ी (तर्क सिद्ध) है|”“मतलब तुम ग़ौर फर्माओगी?” प्रभात ने हैरानी में पूछा |
क्यों नहीं, लेकिन अव्वल मैं उससे मिलना चाहती हूँ |” जवाबन सस्सी ने कहा मानो हुकुम जारी कर रही हो |
ज़रूर...जब भी तुम कहो |” और दोनों के रुखसारों पर एक हलकि मुस्कराहट खिल आई गोया वो बेकली हवा में घुल गयी हो कहीं |
रात के खाने का क्या मंसूबा है?” उसने वापस कुर्सी पर बैठते हुए पूछा |
बीवी घर में नहीं है तो खाना भी घर में नहीं है...
बहुत खूब, चलो तो फिर साथ ही खाते है, और हाँ उस लड़के को भी बुला ही लो | मैं आज रात ही मिल लेती हूँ, और हाँ बेहतर होगा गर तुम उसे हमारे मिलने की वजह बताओ तो |”

जैसा तुम कहो...दोनों के चेहरों पर वो हल्की मुस्कराहट अब भी नुमायाँ थी | प्रभात जाने के लिए मुड़ा तो सस्सी ने पीछे से पुकारा, “मैं तुम्हे साढ़े आठ के क़रीब फ़ोन करूंगी |” और प्रभात बिना मूड़े या रुके जवाब में एक हाथ को कांधो के ऊपर हवा में लहराता हुआ सस्सी के दफ्तर से निकल गया |