Saturday, January 7, 2017

सस्सी . . . दस्तक़-ए-तक़दीर

बम्बई और बारिश - इससे बेहतर और बत्तर बन्दिश भी कहीं कोई मुमकिन हुई है !! यहाँ पानी यूँ बरसता है गोया किसी कोहसार से आबशार बह निकला हो, जो हर चीज़ को छु भर लेना चाहता है फिर वो चाहे इस शहर का गम हों या ख़ुशी, आंसू हों या हसीं, मायूसी हों या इत्मीनान, वफ़ा हों या बेवफाई, इश्क़ हों या नफरत, ख़्वाब हों या हक़ीक़त, झूठ हों या सच - हर चीज़ उसकी हदों की ग़ुलाम हों जाती है | यहाँ की बारिश सब कुछ धो देती है....इस शहर की रुह तक भी | सड़के खुद को छिपा लेतीं हैं इसके पानी के अंदर और खेलती है खेल आँख मिचौली का | निकलती हैं अपनी पनाह से और आँख छपकते ही गायब हो जाती है | छोड़ जाती हैं अपने पीछे नाराज़ और ख़ुश्क (चिड़चिड़ा) लोग |
उनमे दो गुज़रे ज़माने के लोग भी शामिल थे | वो अपने ज़माने का छाता खोलकर खड़े थे जो ग़ालिबन उनके ससुर ने उन्हें तब जहेज़ में दिया होगा जब वो उनकी लाड़ली बेटियोँ को ब्याह कर ले जाने आये होंगे सजकर | वक़्त ने उन लाड़ली बेटियोँ को अब लाड़ली दादियाँ - नानियाँ बना दिया है और जिस्म की जिल्द को चुन्नटों से भर दिया है | इश्क़ - जो परवान चढ़ा था ब्याह के शुरुवाती वक़्त में अब तबदील हो चूका था मामूली झगड़ो में - पंसारी की सौदा, दरिया किनारे की सैर और नवासो के मुस्तक़बिल का फैसला - गोया ये बूढ़े हामी क़यामत के वक़्त तक यूँ ही ज़िंदा रहेंगे मरेंगे नहीं |

बड़े मोटे शीशों वाले चश्में के पीछे महफूज़ बूढ़ी सिकुड़ी हुई आँखे और उन शीशों पर एक एक बूँद करके टपकता पानी उन्हें खीज़ा रहा था | जो वो अक्सर अपनी बीवियों के साथ किसी ऐसी बात पर ज़िरह के वक़्त महसूस करते थे जो उनके लिए तो बहुत माइने रखती थी लेकिन इनके लिए रत्ती भर भी नहीं |
"बाद इक अरसा जी लेने के मख़्सूस चाहत रिश्ते की सतह छोड़ उसकी जड़ों में जज़्ब हो जाती है, और नुमाइश की नहीं महज एहसास की मोहताज़ रह जाती है |"

अगरचे, उनके गुस्से की एक़ और वाज़िब वजह भी थी और वो थी बारिश में धमाल चोकड़ी मचाते बच्चे | जो उनकी जानिब गंदला पानी उछाल रहे थे | एक़ पुरानी कहावत है - बच्चो की ज़िद और बुजुर्गो का गुस्सा एक़ ही चेहरे के दो रुख़्सार होते है : एक़ की जिंदगी खत्म होने की कगार पर होती है और दूसरे की तो अभी बस शुरू ही हुई है | दोनों बूढ़े उन बच्चो के वालिदैन के साथ-साथ बम्बई के वालिदैन को भी कोस रहे थे जिनकी तामीर की हुई सड़के हर साल बारिश का पानी बहा ले जाता है और छोड़ जाता है अपने पीछे हर किस्म के मुख्तलिफ गड्ढे |
इसी बारिश को मुट्ठी में थामे एक कमसिन लड़की सादे लिबास में आज इस शहर की सड़के नापने निकली थी | हाथों में कोई बैग था और ही सर पर कोई ओठ, बस एक मुख़्तलिफ़ सख़्ती तारी थी चेहरे पर उसके | गोया कोई पुराना सूखा हूआ गम हो जिससे बेबस होकर वो यूँ बरसात में गश्त करने पर मजबूर हो गयी थी, वरना हिक़ारत लबरेज़ दिल था | कुछ गाड़ियाँ पानी से लबरेज़ सड़क पर तेज़ी से अपना रास्ता बनाते हुए गुज़री तो खामखाँ पैदल चलने वाले बिगड़ने लगे | गोया उन्हें गाड़ियों से उछलते पानी की उतनी ही फ़िक्र हो जितनी गर्मियों में सूखे हुए नलके देखकर होती है | जो उनकी आँखे और हलक दोनों की प्यास नहीं बुझा सकते | बहरहाल मसला ठीक उसके उलट था हमेशा की तरह दिल और रूह अब भी प्यासे ही थे | कोई ऐसा मी(पानी) कहीं बरसा ही नहीं जो इनकी प्यास बुझा सके |
"कहो तो कही छोड़ दूँ मैं तुम्हे?" इक मुतमइन आवाज़ जो मोटर साइकिल के इंजन की मांद होती गर्राहट से होकर गुज़री और सस्सी के कानों पर ठहरी |
"नहीं, शुक्रिया |"
"तकल्लुफ़ कीजिये, बारिश बहुत तेज़ है | मैं देर सवेर आपको गाडी से छोड़ दूंगा|"
"मालूम होता है आपने सुना नहीं मैंने क्या कहा या फिर आप 'नहीं' के मानी से बेखबर हैं |" सस्सी का पुरशोर जवाब फ़क़त उस मददगार के कानो तक नहीं बल्कि राहगीरों की तवज्जोह भी हासिल कर गया, खास तौर पर उन दोनों बुज़ुर्गो की जो पहले से ही नई नस्ल की बेहूदगियोँ को कोस रहे थे - "तौबा ये आजकल की बदतहज़ीब नस्ल, इनकी बेशर्मियाँ बारिश में भी नहीं रुकती"
"ये मग़रबी तहज़ीब भी कोई तहज़ीब हैं | इसे तो तहज़ीब कहना भी तहज़ीब की तौहीन है, पूरी नस्ल बर्बाद करके रख दी है |"
"तुम सही कहते हो मियां, मेरी तो दानिस्त से बाहर है ये 'गर्लफ्रेंड-बॉयफ्रेंड' का रिश्ता | कहीं से कहीं तक माक़ूल नहीं लगता |"
"हाँ शायद मैं इसके लिए कुछ ज्यादा ही बूढ़ा हो चला हूँ और तुम हासिदाँ (ईर्षापूर्ण) |"
और एक हाँसा फूट निकला जो अपने साथ बहा ले गया सारी मआशरे और तहज़ीब की वसीह बातें गोया इससे बेहतर मज़मून भी कहीं कोई मुमकिन हुआ है वक़्त काटने के लिहाज़ से | एक मखौल में तब्दील हो गई थी सारी बनावटी बातें जिसका लुत्फ़ और भी लोग उठा रहे थे | अक्सर ये बूढ़े हामी बेहतरीन मसखरों में शुमार होते है इनके लतीफ़े तसव्वुर नहीं फ़क़त हक़ीक़त को बयाँ करते है जिन्हे तमाम उम्र सियाह बालों को जिंदगी की धुप में धुनकर सीखा जाता है |
दूसरी जानिब, एक अनकही धमकी ने लड़के की फ़राख़ दिली और नेक-ख्याली को चोट पहुंचाई थी | क़िब्ला वो कुछ और कहती उसे बेइज़्ज़त करने के लिहाज़ से लड़का खुद ही बोल बैठा, "क्यों बारिश में भीगी ख़ूबसूरत लड़कियाँ मोटरसाइकिल सवार फराख दिल लड़को के लिए ऐसा सख्त रवैया इख़्तियार कर लेती हैं मानो करज़ा मांग लिया हो |"
"तुम मुझे छेड़ रहे हो?"
"समंदर में मुख्तलिफ़ मछलियाँ होती हैं और वो सब एक साथ तैरती हैं लेकिन हकीक़त में ऐसा होता नहीं है महज़ ऐसा होने का भरम होता है |"
यह जवाब सस्सी की दानिस्त में दाखिल हो सका, "तुम आखिर कहना क्या चाहते हो?" उसने फिर पूछा |
"एक ख़ास मछली सिर्फ अपने किसी ख़ास के लिए तैरती हैं और वो ख़ास किसी और ख़ास के लिए, तो नतीजा ये हुआ कि तुम मेरी वो ख़ास मछली नहीं हो ... मैं तो सिर्फ मदद करना चाहता हूँ |"
चेहरे की सख्ती नरम पड़ने लगी गोया कोई चॉक्लेट का टुकड़ा हो |
"शुक्रिया लेकिन मैं बारिश में अभी कुछ देर और गुज़ारूँगी |"
"वाकई?"
"हाँ"
"जैसी तुम्हारी मर्ज़ी, वैसे मेरा नाम प्रभात हैं |"
"सस्सी...|"
"मै तुमसे वाकिफ हूँ, हम एक ही ट्रेनिंग बैच में हैं |"
"तुम्हे कभी देखा नहीं ..."
वैसे भी ये बैच इतना बड़ा तो हैं ही कि कोई ख़ास यूँ ही अपने किसी ख़ास को नहीं पा सकता | वैसे, तुम्हारा कोई अब तक दोस्त नहीं बना इस बैच में !"
सस्सी के दिल की शायद कोई गलत तार छू ली थी प्रभात ने, और वैसे भी वो इतना बेपरवाह तो नहीं था कि सस्सी का अकेलापन समझ सके | हालांकि, कभी कभी जरूरी हो जाता हैं ज़ाहिर मौज़ू को भी छेड़ना जो अक्सर यूँ ही नज़रअंदाज़ कर दिए जाते हैं | इस तरह कमअज़कम इन्हे थोड़ी तवज्जोह तो हासिल होती हैं | वरना अगर चेहरा हसमुखः हो तो ज़माना कहता है देखो कितना खुश है ये बेवकूफ़ | मुमकिन है यह सवाल सस्सी की आँखें लबरेज़ कर देता लेकिन प्रभात वाकिफ़ था कि जो लड़की बारिश में तनहा टहलती हो आंसू उसकी आँखों में नहीं दिल में बसते हैं | प्रभात ने उसकी गहरी आँखों में झाँका लेकिन तह को हासिल कर सका | वो मुस्कुराई, और पलटकर चल दी, "घर जाओ प्रभात बारिश तेज़ हैं, ऐसा ना हो कि तुम्हे मोटरसाइकिल से ज्यादा मोटरसाइकिल को तुम्हारी ज़रूरत पड़ जाए |"

उसने मुड़कर नहीं देखा |



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